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मैं बेवफा नहीं भाग 4


 


स्वाति दुल्हन बनकर... घायल ह्रदय लिए जिस ससुराल में पहुंची.. .उस कोठी को देखकर ..उसकी आंखें चौंधिया गईं।


इतने वैभव और  शानो- शौकत की तो.... उसने कल्पना भी नहीं की थी। विवेक आहूजा ...जो लगभग 50  वर्ष का था। देखने में बेहद आकर्षक था ..अच्छे स्वास्थ्य और अच्छे  खान-पान के कारण इतनी उम्र का न लगकर 40 का लगता था।


उसके परिवार में 75 वर्षीय मां शिवानी आहूजा और 80 वर्षीय पिता बलराज आहूजा और एक बहन थी ..जो शादीशुदा थी और जवान बच्चों की मां थी । स्वाति को पता चला कि विवेक की पहली पत्नी और एक बेटी की एक एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई थी। यह करीब 10 वर्ष पहले की बात थी।बलराज आहूजा और शिवानी आहूजा अपने इस बेटे के लिए बहुत चिंतित थे।


ऐसी सुंदर बहू पाकर वे खुशी से फूले नहीं समाए।वे स्वाति को भी बहुत प्यार करते थे ।और विवेक आहूजा..... वह तो जैसे परवाना बना अपनी शमा स्वाति के चारों तरफ मंडराता  ही रहता था। धन की कोई कमी नहीं थी ।


स्वाति महंगी गाड़ियों में घूमती.... महंगे होटलों में खाना खाती थी ...महंगे कपड़े ,गहने में सजी -धजी ,लकदक रहती थी ।अब 

वह  आपादमस्तक बदल गई थी ।जैसे उसे रुपनगर की परी ने जादू की छड़ी फेर कर उसका कायाकल्प कर दिया था ।अब पहले से वह बहुत सुंदर लगती थी।


एक इशारे पर उसके सामने ...उसकी मनचाही चीज हाजिर हो जाती थी। इतना सब होने पर भी वह अमन को नहीं भूल पाई थी। हालांकि उसने अपने आप को ससुराल में वहां के तौर- तरीकों में ढाल लिया था ।सास -ससुर का वह बहुत ख्याल रखती थी ।


उसने उनका दिल जीत लिया था। घर के खानपान की व्यवस्था, सास -ससुर के, खाना -पीना ...समय पर दवा की व्यवस्था.. और घर की साज -सजावट... इन सब कामों की वह देख- रेख रखती थी। काम करने के लिए तो बहुत से नौकर थे ...पर उनको भी देखना भालना था .....तभी तो उनसे  काम कराया जा सकता था। 


लेकिन शादी के बाद उसके होठों पर दोबारा वह हंसी नहीं आई। अब वह पहले वाली स्वाति नहीं रह गई थी। कभी भी वह दोबारा अपने मायके में नहीं गई थी। सभी लोग उसको मायके में बुला -बुला कर थक चुके थे ...उसके भाई-बहन ,माता-पिता सभी  ने उससे बहुत कहा -...पर उनकी आवाजें उसके कानों तक नहीं पहुंचती थीं।


हां !!विवेक से वह जरूर कहती थी ....कि जब भी जरूरत हो पिताजी को रुपयों की कमी नहीं होनी चाहिए ....आखिरकार रुपयों के लिए ही तो उसे बेचा  गया था.... फिर भी रुपयों का अभाव रहा तो फिर क्या लाभ????


उसके सुंदर , सुखद... सपनों की दुनिया जल चुकी थी ....उसकी राख पर बैठकर वह कैसे हँस सकती थी ???आखिर दिल पर उसका कोई जोर नहीं था!!! शरीर से तो वह यंत्र -चालित खिलौने की तरह ...अपने सभी फर्ज पूरे  कर रही थी। पर उसके दिल पर अभी भी अमन का कब्जा था ।


जैसे ही शाम उतरती वह अमन के ख्यालों में खो जाती। उसने उसको धोखा दिया था ....फिर भी वह अमन को भुला नहीं सकी। और तभी अचानक एक दिन विवेक का घर आते समय एक्सीडेंट हो गया। उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई  प्रथम दृष्टया यह एक्सीडेंट लगता था ...पर पुलिस की जांच हत्या की तरफ इशारा कर रही थी।

क्रमशः*************************

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