राजा ने जब यह कहा कि:-" आपका बेटा अगर मुझे अजूबा का तमाशा दिखा दे; तो मैं राजकुमारी का विवाह उससे कर दूंगा।
मंत्री के हृदय को इस बात से सांत्वना मिली, जैसे डूबते हुए को तिनके का सहारा मिला हो। साथ ही साथ मंत्री को इस बात की भी खुशी हुई कि राजा ने उनकी बात को समझा......और इतना मौका भी दिया।
मंत्री ने राजा से कहा :-"
महाराज! मुझे एक महीने की छुट्टी देने की कृपा करें ..क्योंकि इस बात का तो पता ही नहीं है.. कि यह अजूबा का तमाशा है क्या चीज??? कहां सीखने को मिलेगी यह कला ??जब पता ही नहीं है फिर सीखेंगे कहां से?" फिर हाथ जोड़कर कृतज्ञता पूर्वक बोले:-
" महाराज ! आपने मुझ पर बहुत उपकार किया ...जो मुझे इस भयानक झंझावात से उबार लिया !! अब इतनी कृपा और करें
और मुझे अवकाश दें!! मेरे बेटे ने अभी बाहर की दुनिया में कदम नहीं रखा है !! मैं उसके साथ जाऊंगा ...और ढूंढ लूंगा ….कि कोई अजूबा का तमाशा सिखाने वाला मिल जाए !!
महाराज ने कहा:-" जाओ ! मंत्री जी! मैंने तुम्हें छुट्टी दी... मगर याद रहे ...शर्त यही है ..कि जब अजूबा का तमाशा , तुम्हारा बेटा मुझे दिखाएगा ...तभी मैं राजकुमारी का विवाह उससे करूंगा…. वरना नहीं ।
मंत्री लौटकर घर आए। घर में उदासी छाई हुई थी ...और मंत्री की पत्नी सिर झुकाए गम में डूबी बैठी थी।विक्रम तो कोप भवन में था ही ।
मंत्री के घर में आते ही उत्सुकता की लहर दौड़ गई । मंत्री की पत्नी ने पूछा :-"क्या हुआ ?मंत्री ने महाराज वाली पूरी बात बता दी।
विक्रम यह समाचार सुनकर उठ बैठा और जोशपूर्ण स्वर में कहने लगा :-"चाहे संसार के उस छोर तक जाना पड़े ...मैं "अजूबा का तमाशा" सीखकर ही दम लूँगा।
मंत्री और विक्रम के सफर की तैयारियां शुरू हो गई। खाने पीने का सामान ,रुपए -पैसे और जरूरत का सामान रखकर... दोनों पिता-पुत्र घर से रवाना हो गए ।
दोनों पिता-पुत्र हर नगर में पहुंचते ..वहां किसी सराय में ठहरते.. फिर दोनों अपने -अपने घोड़ों पर सवार होकर अलग-अलग दिशाओं में होकर ,..पूरे नगर का चप्पा -चप्पा ढूंढते.. कि शायद कहीं कोई अजूबा सिखाने वाला मिल जाए ।
इस प्रकार कई नगरों मेंउन्होंने ढूंढा लेकिन उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो उन्हें यह कला सिखाता। नगर ,पर्वत, वन,जंगल लांघते,, जगह-जगह की खाक छानते हुए वे शिथिल हो चुके थे
ऐसे ही समय में एक दिन यात्रा करते समय मंत्री ने विक्रम से कहा :-"बेटा ! अब मेरा शरीर जवाब दे रहा है ..अब तो कोई ऐसा स्थान नहीं बचा है ..जहां हम ने खोजा नहीं.. अब तो घर ही लौट चलें !!"
"पिताजी ! आप जाइए ! मैं नहीं जाऊंगा ! ऐसी ही बातें करते- करते दोनों एक गांव से होकर निकले। दोपहर का समय था। गर्मियों के दिन थे ।दोनों ही गर्मी और प्यास से व्याकुल होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गए ।
थोड़ी ही दूरी पर एक कुआं था ।उसमें से पानी निकाल कर दोनों ने पिया ...और खाने-पीने का कुछ सामान निकाला। खा -पीकर दोनों थोड़ा चैतन्य हुए ....तो उन्होंने देखा कि थोड़ी दूरी पर एक हलवाई बैठा हुआ जलेबी बना रहा था। वे उसके पास गए ...कि कुछ जलेबी ही ले ली जाएं ।
वहां पहुंच कर उन्होंने जो दृश्य देखा ..उससे वह आश्चर्यचकित रह गए ..और उनके मुंह से निकल पड़ा :-
"उफ ! गजब है !! चमत्कार है !!"
हलवाई जलेबी बना रहा था। बड़ी सी भट्टी पर कड़ाह चढ़ा हुआ था ।आग जल रही थी... मगर लकड़ी की जगह उसने अपनी एक टांग भट्टी में लगा रखी थी... जो धधक रही थी... यह देखकर मंत्री जलेबी लेना भूल गए ...और उस को एकटक देखते रहे।
थोड़ी देर में हलवाई ने जलेबी बना ली और अपनी टांग भट्टी से बाहर निकाल ली ।मंत्री और विक्रम यह देखकर दंग रह गए कि उसकी टांग एकदम स्वास्थ्य और ठीक थी।
यह देखकर मंत्री अपनी उत्सुकता को दवा नहीं सके और अधीरता से हलवाई से पूछा:-" श्रीमान ! आप की टांग तो भट्ठी में जल रही थी ...पर यह तो बिल्कुल ठीक है... यह कैसा चमत्कार है?"
हलवाई ने उदासीन भाव से उत्तर दिया:-" यह चमत्कार " अजूबा का तमाशा" है !!"
"अजूबा का तमाशा" यह शब्द उनके दिमाग में खनक उठा।
यही कला तो मंत्री और विक्रम को नचाए -नचाए फिर रही थी!! मंत्री और विक्रम के चेहर पर चमक आ गई ! उनके चेहरे खिल उठे!
मंत्री ने अनुनय भरे स्वर में हलवाई से कहा :-"आप मेरे बेटे को अजूबा का तमाशा सिखा दोगे?"
उसने कहा :-"हाँ ! सिखा दूंगा... मगर इसके लिए रकम बहुत देनी पड़ेगी!! क्या सिखा सकोगे??"
" हां ! आप जितना बताएं मैं उतना धन आपको दूंगा!!
हलवाई ने कहा:-" मैं 1000 अशर्फियाँ लूंगा!"
मंत्री ने कहा :-"मैं आपको 1000 अशर्फियाँ दूंगा !आप मेरे बेटे को अजूबा का तमाशा सिखा दें!"
हलवाई ने कहा :-"लेकिन एक बात है ! यह कला सीखना कोई आसान बात नहीं है ।इसमें जान भी जा सकती है ।यह बहुत ही खतरनाक काम है । आप इस बात पर तैयार हैं तो ठीक है... वरना कोई बात नहीं!!!
यह बात सुनकर मंत्री घबराए।
उन्होंने कहा :-" जान जा सकती है ? तो यह कैसी और कौन सी कला है??तब तो मैं यह तमाशा नहीं सिखवाऊंगा ,मेरा इकलौता बेटा है।
मंत्री के ऐसा कहते ही विक्रम तड़प उठा :-"नहीं ,नहीं ! मैं तैयार हूं! चाहे जान भले ही चली जाए ,मैं यह विद्या जरूर सीख लूंगा! मंत्री ने हलवाई को एक हजार अशर्फियाँ दे दीं।
मंत्री ने हलवाई से पूछा :-"आप यह विद्या कितने दिनों में सिखाओगे?"
हलवाई ने कहा :-"एक महीने में !!"
मंत्री ने अपने बेटे से कहा:-" ठीक है ! एक महीने के बाद तुम मुझे यहीं ...इसी जगह ..इसी पेड़ के नीचे मिलना !!"
इतना कहकर मंत्री वहां से रवाना हो गए और हलवाई विक्रम को अपने साथ लेकर चला गया।
क्रमशः ******************************************
Tags:
Story

Hello
ReplyDelete